(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.317. अध्यायः 317
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति जगत्प्रलयप्रकारादिप्रतिपादकजनकयाज्ञवल्क्यसंवादानुवादः॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

याज्ञवल्क्य उवाच। 12-317-0x(6508)(78252)
तत्त्वानां सर्गसङ्ख्या च कालसङ्ख्या तथैव च।
मया प्रोक्ताऽनुपूर्वेण संहारमपि मे शृणु॥ 12-317-1(78253)
यता संहरते जन्तून्ससर्ज च पुनः पुनः।
अनादिनिधनो ब्रह्मा नित्यश्चाक्षर एव च। 12-317-2(78254)
अहःक्षयमथो बुद्ध्वा निशि स्वप्नमनास्तथा।
चोदयामास भगवानव्यक्तोऽहंकृतं नरम्॥ 12-317-3(78255)
ततः शतसहस्रांशुरव्यक्तेनाभिचोदितः।
कृत्वा द्वादशधाऽऽत्मानमादित्यो ज्वलदग्निवत्॥ 12-317-4(78256)
चतुर्विधं प्रजाजातं निर्दहत्याशु तेजसा।
जराय्वण्डस्वेदजातमुद्भिज्जं स नराधिप॥ 12-317-5(78257)
एतदुन्मेषमात्रेण विनष्टं स्थाणुजङ्गमम्।
कूर्मपृष्ठसमा भूमिर्भवत्यथ समन्ततः॥ 12-317-6(78258)
जगद्दग्ध्वाऽमितबलः केवलां जगर्ती ततः।
अम्भसा बलिना क्षिप्रमापूरयति सर्वशः॥ 12-317-7(78259)
ततः कालाग्निमासाद्य तदम्भो याति संक्षयम्।
विनष्टेऽम्भसि राजेन्द्र जाज्वलत्यनलो महान्॥ 12-317-8(78260)
तमप्रमेयातिबलं ज्वलमानं विभावसुम्।
ऊष्माणं सर्वभूतानां सप्ताचिंपमथाञ्जसा॥ 12-317-9(78261)
भक्षयामास भगवान्वायुरष्टात्मको बली।
विचरन्नमितप्राणस्तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा॥ 12-317-10(78262)
तमप्रतिबलं भीममाकाशं ग्रसते पुनः।
आकाशमप्यभिनदन्मनो ग्रसति चारिकम्॥ 12-317-11(78263)
मनो ग्रसति सर्वात्मा सोहंकारः प्रजापतिः।
अहंकारो महानात्मा भूतभव्यभविष्यवित्॥ 12-317-12(78264)
तमप्यनुपमात्मानं विश्वं शंभुः प्रजापतिः।
अणिमा लघिमा प्राप्तिरीशानो ज्योतिरव्ययः॥ 12-317-13(78265)
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ 12-317-14(78266)
हृदयं सर्वभूतानां पर्वणाऽङ्गुष्ठमात्रकः।
अणुग्रसत्यनन्तो हि महात्मा विश्वमीश्वरः॥ 12-317-15(78267)
ततः समभवत्सर्वमक्षयाव्ययमव्रणम्।
भूतभव्यभविष्याणां स्रष्टारमनघं तथा॥ 12-317-16(78268)
एषोप्ययस्ते राजेन्द्र यथावत्समुदाहृतः।
अध्यात्ममधिभूतं च श्रूयतां चाधिदैवतम्॥ ॥ 12-317-17(78269)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि सप्तदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥ 317॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-317-4 संदधेऽयं महीमिति ड. थ. पाठः॥ 12-317-8 पुत्रान्देवानिति ड. थ. पाठः। पुत्रान्पूर्वंमेव महानृषिरिति। पितॄणां पितर इति झ. पाठः॥ 12-317-13 अन्योन्यस्य हिते रता इति झ. ध. पाठः॥ 12-317-21 एतद्वशे हि भूतानीति ट. ड. थ. पाठः॥


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